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        <title><![CDATA[ Igrain India ]]></title>
        <link><![CDATA[ https://igrain.in/feeds ]]></link>
        <description><![CDATA[ Igrain India ]]></description>
        <language>en</language>
        <pubDate>Fri, 17 Apr 2026 17:08:38 +0530</pubDate>
  
                    <item>
                <title><![CDATA[खाद्य तेल की खुदरा कीमतों पर शुल्क कटौती के प्रभाव की समीक्षा]]></title>
                <link><![CDATA[https://backup.igrain.in/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">नई दिल्ली। केन्द्रीय खाद्य, उपभोक्ता मामले एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय द्वारा जारी एक विज्ञप्ति में कहा गया है कि सीमा शुल्क में भारी कटौती किए जाने के बाद खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग के अधिकारियों द्वारा समूचे देश में खाद्य तेलों की प्रमुख रिफाइनिंग एवं प्रोसेसिंग इकाइयों का निरीक्षण-परीक्षण किया गया। </span></p><p><span style="font-size: 1rem;">इसका उद्देश्य क्रूड खाद्य तेलों पर मूल आयात शुल्क को 20 प्रतिशत से घटाकर 10 प्रतिशत नियत किए जाने के बाद रिफाइंड श्रेणी के सोयाबीन तेल, सूरजमुखी तेल तथा पामोलीन के उच्चतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) तथा वितरकों के लिए मूल्य (पीटीडी) पर पड़ने वाले प्रभाव का आंकलन करना है।&nbsp;</span></p><p>जिन राज्यों की खाद्य तेल रिफाइनरीज एवं प्रोसेसिंग सुविधाओं का गहन निरीक्षण-परीक्षण किया गया उसमें महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश एवं गुजरात शामिल है। उल्लेखनीय है कि इन्हीं राज्यों में खाद्य तेल की अधिकांश प्रोसेसिंग इकाइयां क्रियाशील हैं। </p><p>देश की अधिकांश इकाइयों ने खाद्य तेलों के एफआरपी तथा पीटीडी में कटौती कर दी है जिससे रिफाइंड खाद्य तेल का भाव नरम पड़ने लगा है।&nbsp;</p><p>विज्ञप्ति के अनुसार सरकार ने 30 मई 2025 को क्रूड खाद्य तेलों पर मूल आयात शुल्क को 20 प्रतिशत से घटाकर 10 प्रतिशत नियत किया था और यह निर्णय तत्काल प्रभाव से लागू हो गया था। </p><p>इससे क्रूड खाद्य तेलों के आयात खर्च में कमी आ गई और इससे कंपनियों को रिफाइंड खाद्य तेलों के दाम को घटाने में सहायता मिल रही है। </p><p>अप्रैल तक सामान्य से कम आयात होने के बाद मई से खासकर पाम तेल के आयात में बढ़ोत्तरी होने लगी और जून में आयात तेजी से बढ़ने की संभावना है। </p><p>कांडला बंदरगाह पर आयातित खाद्य तेलों से लदे जहाजों का जमघट होने लगा है और इसके क्लीयरेंस में 8-10 दिनों तक का समय लग रहा है। </p><p>समझा जाता है कि निर्यातक देशों में भाव तेज होने से भारतीय आयातकों द्वारा पाम तेल के कुछ अनुबंधों को कैंसिल किया जा रहा है जो जुलाई-अगस्त शिपमेंट के लिए हुए थे।&nbsp;</p><p>सरकार का कहना है कि अगले कुछ दिनों में खाद्य तेल का बाजार काफी हद तक स्थिर हो जाएगा और जिन कंपनियों ने अपने उत्पाद का दाम अभी तक नहीं घटाया है वे भी इसमें कटौती करेंगी। शुल्क कटौती का लाभ धीरे-धीरे आम उपभोक्ताओं तक पहुंचने के संकेत मिल रहे हैं।&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;&nbsp;</p><p>&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;&nbsp;</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/18983</guid>				
                <pubDate>Thu, 19 Jun 2025 17:01:21 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[पंजाब में गेहूं का भंडारण खर्च 100 करोड़ रुपए बढ़ने की आशंका]]></title>
                <link><![CDATA[https://backup.igrain.in/posts/-100-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">चंडीगढ़। भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) को समूचे पंजाब में स्टील सिलोज में गेहूं के भंडारण पर करीब 100 रुपए प्रति क्विंटल का अतिरिक्त खर्च करना पड़ रहा है। </span></p><p><span style="font-size: 1rem;">चूंकि राज्य में इन सिलोज की कुल भंडारण क्षमता 9.85 लाख टन की है इसलिए खाद्य निगम का कुल अतिरिक्त भंडारण खर्च करीब 100 करोड़ रुपए बढ़ सकता है। इससे इस पर भारी आर्थिक दबाव पड़ने की संभावना है।&nbsp;</span></p><p>खर्च में होने वाली इस बढ़ोत्तरी का मुख्य कारण यह है कि भारतीय खाद्य निगम ने सिलोज में गेहूं के भंडारण के लिए आढ़तियों (कमीशन एजेंटों) को चुकाए जाने वाले कमीशन (दामी) में कटौती करने का निर्णय लिया है। </p><p>इस कमीशन या दामी को 46 रुपए प्रति क्विंटल से आधा घटाकर अब 23 रुपए प्रति क्विंटल निश्चित किया गया है। उल्लेखनीय है कि इस स्टील सिलोज का निर्माण इस तरह किया जाता है कि इसमें भंडारित गेहूं पांच साल तक सुरक्षित रह सकता है। </p><p>उसमें निर्यात (वैक्यूम) जैसी स्थिति रखी जाती है। ये सिलोज भारतीय खाद्य निगम के अनाज प्रबंधन की खरीदी का एक महत्वपूर्ण भाग माने जाते हैं। </p><p>लेकिन दामी (कमीशन) में 50 प्रतिशत की भारी कटौती का आढ़तियों एवं किसान संगठनों द्वारा जबरदस्त विरोध किया जा रहा है। इससे किसानों को सीधे सिलोज तक गेहूं पहुंचाने में दिलचस्पी घट जाएगी।&nbsp;</p><p>पंजाब के खाद्य विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि मौजूदा परिस्थितियों में अब पहले गेहूं को गन्नी बोरियों में पैक करना पड़ेगा और फिर उसे सिलोज तक पहुंचाना होगा। </p><p>गोदामों में गेहूं की गन्नी बोरियों में पैकिंग तथा उसे सिलोज तक पहुंचाने के लिए परिवहन का अतिरिक्त खर्च झेलना पड़ेगा। परिवहन खर्च में 100 रुपए प्रति क्विंटल की वृद्धि हो जाएगी। </p><p>उधर भारतीय खाद्य निगम ने कमीशन (दामी) में भारी कटौती के निर्णय को न्यायोचित बताते हुए कहा है कि जब गेहूं का स्टॉक एक बार सिलोज में पहुंच जाता है तब उसके रख रखाव एवं प्रबंधन में आढ़तियों की भूमिका घट जाती है। </p><p>लेकिन आढ़तियों का तर्क है कि सामान्य मंडियों से गेहूं के स्टॉक का उठाव करके उसे सिलोज में भंडारित करने तक की प्रक्रिया काफी जटिल होती है और इसमें काफी श्रम एवं समय लगता है इसलिए 'दामी' में कटौती नहीं होनी चाहिए।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/18981</guid>				
                <pubDate>Thu, 19 Jun 2025 16:11:41 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[सीमित कारोबार के बीच कनाडा में मटर का भाव स्थिर]]></title>
                <link><![CDATA[https://backup.igrain.in/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">सस्काटून। बिजाई की प्रक्रिया समाप्त होने के बाद अब मटर के आयातकों- निर्यातकों का ध्यान नई फसल की प्रगति पर केन्द्रित हो गया है और इसलिए वर्तमान स्टॉक वाले माल में कारोबार की गति धीमी पड़ गई है। </span></p><p><span style="font-size: 1rem;">पश्चिमी कनाडा और खासकर सस्कैचवान प्रान्त की मंडियों में पीली मटर का भाव करीब 10 डॉलर प्रति बुशेल और अधिकतम 3 प्रतिशत चिपटे दाने वाली हरी मटर का दाम लगभग 16.50 डॉलर प्रति बुशेल बताया जा रहा है। </span></p><p><span style="font-size: 1rem;">हालांकि चालू मार्केटिंग सीजन के अंत में कनाडा में मटर का अत्यन्त विशाल बकाया अधिशेष स्टॉक बचने की संभावना नहीं है लेकिन यह सामान्य औसत स्तर से कुछ अधिक रह सकता है।&nbsp;</span></p><p>2025-26 का नया मार्केटिंग सीजन अगस्त में औपचारिक तौर पर शुरू होगा। चीन में कनाडाई मटर पर मार्च से ही 100 प्रतिशत का भारी-भरकम आयात शुल्क लगा हुआ है और रूस से फीड श्रेणी की मटर का ज्यादा उत्पादन होता है तो चीन में खाद्य उद्देश्य के लिए इसका आयात बढ़ सकता है। </p><p>चीन में कनाडा से मटर के आयात पर अनिश्चितता बरकरार है क्योंकि वहां दोगुने मूल्य स्तर पर इसका आयात करना आर्थिक दृष्टि से नुकसानदायक साबित होगा।&nbsp;</p><p>जहां तक भारत का सवाल है तो यहां पूर्व में आयातित पीली मटर का अच्छा खासा स्टॉक अभी मौजूद है और घरेलू नई फसल का माल भी उपलब्ध है। दाल-दलहन बाजार में नरमी का माहौल होने से पीली मटर का दाम भी नीचे चल रहा है इसलिए भारतीय आयातक इसके आयात में जोरदार सक्रियता नहीं दिखा रहे हैं। </p><p>वैसे भारत सरकार के 31 मार्च 2026 तक की अवधि के लिए पीली मटर के आयात को सीमा शुल्क से मुक्त कर दिया है इसलिए भारतीय आयातकों को कोई जल्दबाजी नहीं है।&nbsp;</p><p>कनाडा में मटर का बिजाई क्षेत्र सामान्य रहा है मगर प्रमुख उत्पादक इलाकों में मौसम एवं वर्षा की हालत फसल के लिए पूरी तरह अनुकूल नहीं है। मटर के उत्पादन में ज्यादा इजाफा होना मुश्किल लगता है। पीली मटर की पुरानी एवं नई फसल के माल का भाव लगभग समान हो गया है।&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/18979</guid>				
                <pubDate>Thu, 19 Jun 2025 15:34:10 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[ईरान में भारतीय बासमती चावल के निर्यात में भारी गिरावट आने की आशंका]]></title>
                <link><![CDATA[https://backup.igrain.in/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">नई दिल्ली। कुछ वर्ष पूर्व भारतीय बासमती चावल का सबसे बड़ा आयातक देश बन गया था मगर अब फिलहाल तीसरे नम्बर पर आ गया है। इजरायल के साथ भयंकर युद्ध में फंसे ईरान में भारत से बासमती चावल के आयात में भारी गिरावट आने की आशंका है।</span></p><p><span style="font-size: 1rem;"> भारतीय बासमती चावल का निर्यात ऑफर मूल्य पहले ही 10 प्रतिशत से ज्यादा घट चुका है। यदि ईरान में निर्यात ठप्प पड़ गया तो ऑफर मूल्य में और करीब 20 प्रतिशत की गिरावट आ सकती है।&nbsp;</span></p><p>इजरायल के ताबड़ तोड़ हमलों और ईरान की भयंकर जवाबी कार्रवाई के बीच होर्मुज जलडमरू मध्य के बंद होने की आशंका बढ़ गई है जबकि यह फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी से और फिर अरब सागर से जोड़ता है। </p><p>इस मार्ग के बंद हो जाने पर भारत सहित दक्षिण-पश्चिम एशिया के अन्य देशों को कैप ऑफ गुड होप के रास्ते अपने उत्पादों का शिपमेंट करना पड़ेगा। यह रास्ता काफी लम्बा है और इसलिए इसका उपयोग करने पर शिपमेंट खर्च बढ़ेगा और समय भी ज्यादा लगेगा। इन घटनाक्रमों के बीच घरेलू बाजार में 17 जून को बासमती चावल का भाव 300 रुपए प्रति क्विंटल घट गया। </p><p>नवी मुम्बई के वाशी मार्केट में बासमती सेला चावल का दाम 6400/6500 रुपए प्रति क्विंटल से गिरकर 6000/6100 रुपए प्रति क्विंटल पर आ गया। </p><p>इसी तरह 1121 बासमती चावल का मूल्य 8000 रुपए प्रति क्विंटल से फिसलकर 7800 रुपए प्रति क्विंटल तथा 1009 बासमती चावल का भाव 300 रुपए घटकर 6800/6900 रुपए प्रति क्विंटल रह गया।&nbsp;</p><p>दिल्ली के एक अग्रणी निर्यातक का कहना है कि भारतीय बासमती चावल का निर्यात ऑफर मूल्य पिछले माह के 1050/1100 डॉलर प्रति टन से घटकर अब 900/950 डॉलर प्रति टन रह गया है जबकि आगामी समय के दौरान इसमें 10/20 प्रतिशत की और गिरावट आ सकती है। ईरान पर भारतीय निर्यातकों का ध्यान केन्द्रित है।&nbsp;</p><p>भारत से ईरान को वित्त वर्ष 2018-19 में बासमती चावल का कुल निर्यात बढ़कर 14.84 लाख टन के शीर्ष स्तर पर पहुंच गया था जो 2019-20 में गिरकर 13.19 लाख टन तथा 2020-21 में घटकर 7.48 लाख टन पर सिमट गया। </p><p>इसके बाद वित्त वर्ष 2021-22 में 9.98 लाख टन तथा 2022-23 में 9.99 लाख टन बासमती चावल का निर्यात ईरान को किया गया मगर 2023-24 में यह घटकर 6.71 लाख टन पर अटक गया। 2024-25 में निर्यात कुछ बढ़कर 8.55 लाख टन पर पहुंचा। </p><p>भारत से बासमती चावल का कुल निर्यात 2023-24 के 52.42 लाख टन से उछलकर 2024-25 में 60.65 लाख टन से भी ऊपर पहुंच गया।&nbsp;</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/18974</guid>				
                <pubDate>Thu, 19 Jun 2025 13:43:27 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[मध्य प्रदेश में समय से पूर्व मानसून के पहुंचने से किसानों की सक्रियता बढ़ी]]></title>
                <link><![CDATA[https://backup.igrain.in/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">ग्वालियर। दक्षिण-पश्चिम मानसून न केवल मध्य प्रदेश में पहुंच गया है बल्कि काफी तेजी से आगे भी बढ़ रहा है। इसने राज्य के अधिकांश जिलों को कवर कर लिया है और अगले कुछ दिनों में शेष जिलों में भी इसके पहुंचने की उम्मीद है। </span></p><p><span style="font-size: 1rem;">कल यानी 18 जून को इसकी गति बहुत तेज देखी गई। मौसम विभाग के मुताबिक मध्य प्रदेश के 35 जिलों में मानसून सक्रिय हो चुका है जिसमें ग्वालियर भी शामिल है।&nbsp;</span></p><p>उल्लेखनीय है कि दक्षिण-पश्चिम मानसून मध्य प्रदेश में 16 जून को पहुंचा था। उस दिन खंडवा, खरगोन, बुरहानपुर तथा बड़वानी जैसे पश्चिमी जिलों में बारिश हुई थी। </p><p>फिर मानसून दक्षिणी भाग के 17-18 जिलों में पहुंचा और 18 जून को उत्तरी तथा मध्यवर्ती जिलों में सक्रिय हो गया। इससे मध्य प्रदेश के किसानों को खरीफ फसलों की बिजाई में अच्छी सहायता मिल रही है। </p><p>इससे पूर्व ऊंचे तापमान और बारिश के अभाव के कारण किसानों की चिंता बढ़ गई है थी। 18 जून को ही मानसून अपने नियत समय से 8 दिनों पूर्व ग्वालियर पहुंच गया जबकि 2021 में 19 जून को पहुंचा था।&nbsp;</p><p>मौसम विभाग के मुताबिक दक्षिण-पश्चिम मानसून अब तक मध्य प्रदेश के जिन 35 जिलों में पहुंच चुका है उसमें उज्जैन, रतलाम, मंदसौर, नीमच, छतरपुर, पन्ना, टीकमगढ़, दमोह, सागर, राजगढ़, भोपाल, विदिशा, रायसेन, शाजापुर, आगर, सतना, </p><p>रीवा, निवारी, सिंगरौली, सीधी, शहडोल, अनूपपुर, जबलपुर , मैहर, कटनी, उमरिया, शिवपुरी, अशोक नगर, गुना, नरसिंहपुर, दतिया, मुरैना, ग्वालियर एवं श्योपुर कलां सम्मिलित है। </p><p>लेकिन इंदौर और इसके आसपास के जिलों में इसका पहुंचना बाकी था। उम्मीद की जा रही है कि शीघ्र ही मानसून शेष जिलों को भी कवर कर लेगा।</p><p>मध्य प्रदेश में खरीफ सीजन के दौरान धान, दलहन, तिलहन, मोटे अनाज तथा कपास सहित अन्य फसलों की खेती बड़े पैमाने पर होती है। वह सोयाबीन तथा उड़द का सबसे प्रमुख उत्पादक राज्य माना जाता है। </p><p>इसके अलावा वहां तुवर, मूंग, मक्का, ज्वार-बाजरा तथा अन्य फसलों की खेती भी बड़े पैमाने पर होती है। किसानों को मानसून के आने का इंतजार था जो अब खत्म हो गया है। और इसलिए शीघ्र ही वहां खरीफ फसलों की बिजाई की रफ्तार तेज होने की उम्मीद है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/18972</guid>				
                <pubDate>Thu, 19 Jun 2025 12:30:52 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[सीमा शुल्क में कटौती के बाद खाद्य तेलों की कीमतों में आई नरमी]]></title>
                <link><![CDATA[https://backup.igrain.in/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">नई दिल्ली। सरकारी तौर पर दावा किया गया है कि क्रूड खाद्य तेलों पर मूल आयात शुल्क में भारी कटौती होने के बाद खाद्य तेलों के निर्माण एवं व्यवसाय से जुड़ी अधिकांश कम्पनियों ने अपने उत्पाद के उच्चतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) तथा वितरकों के लिए मूल्य (पीटीडी) को घटाना शुरू कर दिया है। इससे आम उपभोक्ताओं को राहत मिलेगी। </span></p><p><span style="font-size: 1rem;">उल्लेखनीय है कि सरकार ने 30 मई 2025 को एक अधिसूचना जारी करके क्रूड श्रेणी के पाम तेल, सोयाबीन तेल तथा सूरजमुखी तेल का मौलिक आयात शुल्क को 20 प्रतिशत से घटाकर 10 प्रतिशत निर्धारित किया था जिससे इस पर कुल प्रभावी सीमा शुल्क भी 27.5 प्रतिशत से घटकर 16.05 प्रतिशत रह गया। दूसरी ओर रिफाइंड खाद्य तेल पर आयात शुल्क 35.75 प्रतिशत के पिछले स्तर पर बरकरार रहा क्योंकि इसमें कोई कटौती नहीं की गई।&nbsp;</span></p><p>आधिकारिक सूत्रों के अनुसार अधिकांश कंपनियों ने खाद्य तेलों का दाम घटा दिया है जबकि कई अन्य फर्मों ने सरकार को आश्वस्त किया है कि वे अगले कुछ दिनों में कीमत घटाने की कोशिश करेगी। </p><p>इन कंपनियों को सस्ते दाम पर विदेशों से क्रूड खाद्य तेलों का आयात करने का अवसर मिल रहा है और इसलिए वह उपभोक्ताओं तक उसका फायदा पहुंचा रही है।&nbsp;</p><p>उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) में 3.56 प्रतिशत की भारत हिस्सेदारी रखने वाले खाद्य तेल एवं वसा में मई 2025 के दौरान महंगाई की दर बढ़कर 17.91 प्रतिशत पर पहुंच गई जबकि मई 2024 में यह 6.71 प्रतिशत के ऋणात्मक स्तर पर चल रही थी। </p><p>समीक्षाधीन अवधि के दौरान खुदरा महंगाई दर सरसों तेल में 19.61 प्रतिशत, रिफाइंड सोयाबीन तेल एवं सूरजमुखी तेल में 24.27 प्रतिशत, नारियल तेल में 78.04 प्रतिशत तथा वनस्पति में 21.32 प्रतिशत दर्ज की गई मगर मूंगफली तेल के दाम में 1.77 प्रतिशत की गिरावट आ गई।&nbsp;</p><p>गत 11 जून को केन्द्रीय खाद्य सचिव के साथ खाद्य तेल उद्योग के प्रमुख संघों- संगठनों एवं मैन्युफैक्चर्स के प्रतिनिधियों की एक महत्वपूर्ण मिटिंग हुई थी जिसमें खाद्य सचिव ने कंपनियों को तत्काल प्रभाव से शुल्क कटौती का लाभ आम उपभोक्ताओं तक पहुंचाने के लिए कहा था।&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/18969</guid>				
                <pubDate>Thu, 19 Jun 2025 11:39:54 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[तेलंगाना में अच्छी बारिश के बावजूद खरीफ फसलों की बिजाई गत वर्ष से काफी पीछे]]></title>
                <link><![CDATA[https://backup.igrain.in/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">हैदराबाद। दक्षिण भारत में धान और कपास के सबसे प्रमुख उत्पादक प्रान्त- तेलंगाना में यद्यपि इस बार दक्षिण-पश्चिम मानसून की अच्छी वर्षा हुई है और मानसून-पूर्व की बारिश भी सामान्य रही थी मगर इसके बावजूद खरीफ फसलों की बिजाई गत वर्ष से काफी पीछे चल रही है। इसके तहत खासकर कपास के क्षेत्रफल में भारी गिरावट आई है और दलहनों का रकबा भी काफी घट गया है।&nbsp;</span></p><p>राज्य कृषि विभाग तेलंगाना में 18 जून तक खरीफ फसलों का कुल उत्पादन क्षेत्र 25.28 लाख एकड़ से 6.11 लाख एकड़ घटकर 19.17 लाख एकड़ पर अटक गया। </p><p>इसके तहत यद्यपि धान सहित अनाजी फसलों का रकबा 98 हजार एकड़ से सुधरकर 1.03 लाख एकड़ तिलहन फसलों का बिजाई क्षेत्र 34 हजार एकड़ से उछलकर 1.04 लाख एकड़ पर पहुंचा मगर दलहन फसलों का उत्पादन क्षेत्र 1.17 लाख एकड़ से घटकर 55 हजार एकड़ और कपास का क्षेत्रफल 19.59 लाख एकड़ से लुढ़ककर 15.27 लाख एकड़ रह गया।&nbsp;</p><p>गत वर्ष के मुकाबले वर्तमान खरीफ सीजन के दौरान तेलंगाना में धान का उत्पादन क्षेत्र 34 हजार एकड़ से सुधरकर 36 हजार एकड़, ज्वार का रकबा 14 हजार एकड़ से बढ़कर 18 हजार एकड़ तथा रागी का बिजाई क्षेत्र 20 एकड़ से उछलकर 55 एकड़ पर पहुंचा लेकिन उम्मीद के विपरीत का क्षेत्रफल 50 हजार एकड़ से फिसलकर 49 हजार एकड़ के करीब रह गया।&nbsp;</p><p>दलहन फसलों में अरहर (तुवर) का उत्पादन क्षेत्र पिछले साल के 1.01 लाख एकड़ से लुढ़ककर इस बार 51 हजार एकड़ के करीब सिमट गया। इसी तरह मूंग का बिजाई क्षेत्र 14 हजार एकड़ से घटकर 4 हजार एकड़ और उड़द का क्षेत्रफल 2 हजार एकड़ से गिरकर 1 हजार एकड़ रह गया।&nbsp;</p><p>तिलहन फसलों के संवर्ग में मुख्यत: सोयाबीन की खेती हुई है। इसका उत्पादन क्षेत्र गत वर्ष के 32 हजार एकड़ से उछलकर इस बार 1.04 लाख एकड़ से ऊपर पहुंच गया है। इसके अलावा 52 एकड़ में मूंगफली एवं 80 एकड़ में अरंडी की खेती हुई है। </p><p>गन्ना का रकबा 6 हजार एकड़ के करीब पहुंचा है जबकि अन्य फसलों की बिजाई सामान्य गति से आगे बढ़ रही है। इस बार कपास की खेती में किसानों की दिलचस्पी कम देखी जा रही है </p><p>क्योंकि 2024-25 के मार्केटिंग सीजन में बाजार भाव कमजोर रहने से किसानों को अपना अधिकांश स्टॉक सरकारी एजेंसी को बेचना पड़ा था। तेलंगाना देश में कपास का तीसरा सबसे प्रमुख उत्पादक राज्य है। आगामी समय में वहां बिजाई की गति तेज होने की उम्मीद है।&nbsp; &nbsp; &nbsp;&nbsp;</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/18962</guid>				
                <pubDate>Thu, 19 Jun 2025 10:53:03 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[चीन को पीछे छोड़कर भारत बना चावल का सबसे बड़ा उत्पादक देश]]></title>
                <link><![CDATA[https://backup.igrain.in/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">नई दिल्ली। भारत 2011-12 से ही दुनिया में चावल का सबसे प्रमुख निर्यातक देश बना हुआ है और तमाम नियंत्रणों-शुल्कों के बावजूद उसकी यह पोजीशन बरकरार रही। चावल के वैश्विक निर्यात कारोबार में भारत की भागीदारी 40-42 प्रतिशत केआसपास रहती है।</span></p><p><span style="font-size: 1rem;"> चावल के उत्पादन में चीन पहले और भारत दूसरे नम्बर पर चल रहा था मगर 2024-25 के मार्केटिंग सीजन में चीन को पीछे छोड़कर भारत संसार में चावल का सबसे बड़ा उत्पादक देश बन गया। यह वास्तविकता सिर्फ केन्द्रीय कृषि मंत्रालय के आंकड़ों से नहीं बल्कि अमरीकी कृषि विभाग (उस्डा) के आंकड़ों से भी प्रमाणित होती है।&nbsp;</span></p><p>अपनी मई माह की रिपोर्ट में उस्डा ने 2024-25 के सीजन के दौरान भारत चावल का कुल उत्पादन बढ़कर 14.80 करोड़ टन के सर्वकालीन सर्वोच्च स्तर पर पहुंच जाने का अनुमान लगाया है जो चीन के अनुमानित उत्पादन 14.60 करोड़ टन से भी 20 लाख टन ज्यादा है। </p><p>उस्डा के मुताबिक 2025-26 के सीजन में भारत में चावल का उत्पादन और भी बढ़ सकता है क्योंकि सरकार ने धान के न्यूनतम समर्थन मूल्य में 69 रुपए प्रति क्विंटल का इजाफा कर दिया है और दक्षिण-पश्चिम मानसून सीजन के दौरान देश में सामान्य औसत से अधिक बारिश होने की उम्मीद है।</p><p> 2025-26 के सीजन में भारत में चावल का सकल उत्पादन बढ़कर 15.10 करोड़ टन के ऐतिहासिक रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच जाने का अनुमान लगाया गया है जो घरेलू मांग एवं खपत से बहुत ज्यादा होगा और इसलिए निर्यात योग्य स्टॉक में भारी वृद्धि होगी। </p><p>केन्द्र सरकार सभी किस्मों एवं श्रेणियों के चावल के निर्यात को पूरी तरह नियंत्रण मुक्त कर चुकी है और देश से इसका शानदार शिपमेंट भी हो चुका है। </p><p>धान की खेती के प्रति देशभर के किसानों में उत्साह एवं आकर्षक बरकरार है जिससे इसका क्षेत्रफल ऊंचे स्तर पर रहने की संभावना है।&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/18947</guid>				
                <pubDate>Wed, 18 Jun 2025 20:41:35 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[बिहार में एमएसपी पर दलहन-तिलहन की खरीद के प्रस्ताव को मंजूरी]]></title>
                <link><![CDATA[https://backup.igrain.in/posts/---]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">पटना। बिहार में बुनियादी ढांचागत सुविधाओं का विकास-विस्तार करने, पर्यटन क्षेत्र को बढ़ावा देने तथा कृषि क्षेत्र एवं किसानों की उन्नति-प्रगति सुनिश्चित करने के उद्देश्य के साथ मंत्रिमंडल (कैबिनेट) ने पिछले दिन अनेक प्रस्तावों को मंजूरी प्रदान कर दी। </span></p><p><span style="font-size: 1rem;">इसके तहत राज्य के छह छोटे हवाई अड्डों का विकास करना, पटना में एक पांच सितारा होटल का निर्माण करना, न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर किसानों से दलहन-तिलहन की खरीद करना तथा शिक्षा विभाग के लिए नए कैडर्स का निर्माण करना आदि शामिल है। इन सभी महत्वपूर्ण प्रयासों को एक ही मीटिंग में अनुमोदित कर दिया गया।&nbsp;</span></p><p>जिन छह शहरों में हवाई अड्डों का विकास-विस्तार किया जाएगा उसमें मुजफ्फरपुर, सहरसा, मुंगेर, मधुबनी, वाल्मीकि नगर एवं वीरपुर शामिल है।</p><p>बिहार मंत्रिमंडल ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए राज्य के किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर दलहन एवं तिलहन फसलों की खरीद का निर्णय लिया है। 2025-26 के रबी मार्केटिंग सीजन में इसकी शुरुआत की जाएगी। </p><p>इसके तहत चना, मसूर एवं सरसों की खरीद का फैसला किया गया है। उल्लेखनीय है कि 2025-26 के मार्केटिंग सीजन हेतु सरकार ने चना का न्यूनतम समर्थन मूल्य 5650 रुपए प्रति क्विंटल, मसूर का एमएसपी 6700 रुपए प्रति क्विंटल तथा सरसों का समर्थन मूल्य 5950 रुपए प्रति क्विंटल निर्धारित किया है। </p><p>हालांकि बिहार में इन सभी फसलों की कटाई-तैयारी पहले ही पूरी हो चुकी है और काफी सारा माल भी मंडियों में आ चुका है लेकिन जिन किसानों के पास इसका स्टॉक मौजूद है उन्हें बिहार सरकार के इस निर्णय से फायदा हो सकता है। </p><p>इससे उत्पादन बढ़ाने तथा किसानों की आमदनी सुनिश्चित करने में सहायता मिलेगी। बिहार में रबी सीजन के दौरान चना, मसूर एवं सरसों की अच्छी खेती होती है मगर किसानों को आकर्षक मूल्य प्राप्त करने के लिए कठिन संघर्ष करना पड़ता है।&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/18938</guid>				
                <pubDate>Wed, 18 Jun 2025 18:00:40 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[सीमा शुल्क में अंतर बढ़ने से नेपाली रिफाइंड खाद्य तेल का आयात घटने की संभावना]]></title>
                <link><![CDATA[https://backup.igrain.in/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">मुम्बई। भारत में नेपाल से रिफाइंड खाद्य तेलों के आयात में भारी गिरावट आने की संभावना है क्योंकि क्रूड खाद्य तेलों के सापेक्ष रिफाइंड तेलों पर आयात शुल्क के बीच अंतर बढ़ गया है। मालूम हो कि 30 मई को केन्द्र सरकार ने क्रूड श्रेणी के पाम तेल, सोयाबीन तेल एवं सूरजमुखी तेल का मूल्य आयात शुल्क को 20 प्रतिशत से घटाकर 10 प्रतिशत नियत कर दिया </span></p><p><span style="font-size: 1rem;">जिससे कुल प्रभावी सीमा शुल्क 27.5 प्रतिशत से घटकर 16.5 प्रतिशत रह गया। दूसरी ओर रिफाइंड खाद्य तेलों पर आयात शुल्क के ढांचे में कोई बदलाव नहीं करते हुए इसे 35.75 प्रतिशत के पुराने स्तर पर ही बरकरार रखा गया।&nbsp;</span></p><p>सरकार के इस निर्णय से भारतीय रिफाइनर्स एवं खाद्य तेल उपभोक्ताओं को राहत मिलने की उम्मीद है क्योंकि एक तरफ रिफाइनर्स का लाभांश बढ़ेगा तो दूसरी ओर उपभोक्ताओं को कुछ सस्ते दाम पर खाद्य तेल प्राप्त हो सकेगा। देश में रिफाइंड खाद्य तेलों के आयात में काफी कमी आ जाएगी।&nbsp;</p><p>एक अग्रणी एग्री कॉमोडिटी रिसर्च फर्म- आई ग्रेन इंडिया के डायरेक्टर राहुल चौहान के अनुसार नए घटनाक्रम के तहत नेपाल से रिफाइंड खाद्य तेलों के आयात में 30 प्रतिशत से अधिक की गिरावट आने की संभावना है क्योंकि क्रूड और रिफाइंड खाद्य तेलों के बीच सीमा शुल्क का अंतर बढ़ गया है। </p><p>नेपाल को दक्षिण एशिया मुक्त व्यापार क्षेत्र (साफ्टा) समझौते के तहत भारत में खाद्य तेलों के शुल्क निर्यात की अनुमति मिली थी जिससे वह सस्ते दाम पर भारत को रिफाइंड खाद्य तेल भेज रहा था। </p><p>अब स्वयं भारत में अपेक्षाकृत कम मूल्य पर रिफाइंड खाद्य तेल उपलब्ध होने से नेपाली निर्यातकों को शुल्क रियायत का समुचित लाभ नहीं मिल पाएगा और उसकी खरीद में भारतीय आयातकों की दिलचस्पी घट जाएगी।&nbsp;</p><p>क्रूड एवं रिफाइंड खाद्य तेलों पर लगे आयात शुल्क के बीच पहले केवल 8.25 प्रतिशत का अंतर था जो अब बढ़कर 19.25 प्रतिशत हो गया है सीमा शुल्क में कटौती होने के बाद भारत में खाद्य तेलों के दाम में 80-90 रुपए प्रति 10 किलो की गिरावट आ चुकी थी लेकिन जब वैश्विक बाजार भाव में तेजी आने लगी तब घरेलू बाजार में भी दाम तेज होने लगा। </p><p>आगामी महीनों में मूल्य घटकर कुछ नीचे आ सकता है। जुलाई-अगस्त के दौरान नेपाल से खाद्य तेलों के आयात में गिरावट आने की संभावना है। </p><p>लेकिन यह आयात पूरी तरह बंद होना मुश्किल लगता है। सार्क संगठन के देशों को भारत में शून्य शुल्क पर खाद्य तेल भेजने की अनुमति दी गई है।&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;&nbsp;</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/18934</guid>				
                <pubDate>Wed, 18 Jun 2025 17:06:59 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[वियतनामी चावल की निर्यात आय में 19 प्रतिशत की भारी गिरावट]]></title>
                <link><![CDATA[https://backup.igrain.in/posts/-19-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">हनोई। हालांकि पिछले साल के मुकाबले चालू वर्ष के दौरान वियतनाम से चावल की निर्यात मात्रा में बढ़ोत्तरी हुई है मगर अंतर्राष्ट्रीय बाजार भाव कमजोर रहने से निर्यात आय में गिरावट आ गई। कृषि मंत्रालय के अनुसार चालू वर्ष के शुरूआती पांच महीनों में यानी जनवरी-मई 2025 के दौरान देश से करीब 45 लाख टन चावल का निर्यात हुआ जिससे 2.34 अरब डॉलर की आमदनी हुई। </span></p><p><span style="font-size: 1rem;">इस तरह पिछले साल के मुकाबले इस वर्ष चावल के निर्यात में मात्रा की दृष्टि से 12.2 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई लेकिन आमदनी के लिहाज से 8.9 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। </span></p><p><span style="font-size: 1rem;">निर्यात आय में आई इस जोरदार कमी का मुख्य कारण चावल के फ्री ऑन बोर्ड औसत इकाई निर्यात ऑफर मूल्य का काफी नीचे रहना है। यह निर्यात ऑफर मूल्य पिछले साल से 18.7 प्रतिशत या करीब 0.516 डॉलर प्रति किलो नीचे है।</span></p><p>वियतनाम के घरेलू प्रभाग में सबसे प्रमुख उत्पादक क्षेत्र- मेकांग डेल्टा में धान का भाव पिछले कई दिनों से स्थिर बना हुआ है। विंह लोंग एवं तियेन गियांग जैसे प्रांतों में आई आर 50404 किस्म के धान का भाव 6600 डांग (वियतनाम मुद्रा) या 0.26 डॉलर प्रति किलो चल रहा है। </p><p>अन्य किस्मों के धान का दाम भी 7000 से 8100 डांग प्रति किलो के बीच बताया जा रहा है। जास्मीन धान की कीमत बढ़कर 8400 डांग प्रति किलो हो गई है जबकि एसटी 25 किस्म का धान सबसे महंगा बना हुआ है जिसके मूल्य 9500 डांग प्रति किलो चल रहा है।</p><p>गियांग प्रान्त में नए धान का कारोबार 5400-5600 डांग प्रति किलो के मूल्य स्तर पर हो रहा है जबकि अन्य किस्मों की कीमत भी कुछ नरम हुई है। वहां चावल के खुदरा मूल्य में भी अंतर देखा जा रहा है। </p><p>जास्मिन चावल का भाव 16,000-18,000 डांग प्रति किलो के बीच पहुंच गया है। इसी तरह थाईलैंड से&nbsp; आयातित लम्बे दाने वाले सुगंधित चावल का मूल्य 20,000-22,000 डांग प्रति किलो बताया जा रहा है। ताइवानी खुशबूदार चावल 20,000 डांग प्रति किलो पर उपलब्ध है।&nbsp;</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/18928</guid>				
                <pubDate>Wed, 18 Jun 2025 16:03:33 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[मई में इंडोनेशियाई पाम तेल के निर्यात में अच्छी बढ़ोत्तरी]]></title>
                <link><![CDATA[https://backup.igrain.in/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">जकार्ता। दुनिया में पाम तेल के सबसे प्रमुख उत्पादक एवं निर्यातक देश- इंडोनेशिया से क्रूड पाम तेल (सीपीओ) के बजाए रिफाइंड श्रेणी के पाम तेल / पामोलीन के निर्यात को ज्यादा प्रोत्साहित किया जा रहा है। </span></p><p><span style="font-size: 1rem;">अप्रैल 2025 में वहां से पाम तेल के उत्पादों का निर्यात काफी घट गया था लेकिन मई माह के दौरान इसमें शानदार बढ़ोत्तरी दर्ज की गई। प्राइवेट कार्गो सर्वेयर कंपनी- इंटरटेक टेस्टिंग सर्विसेज (आईटीएस) की रिपोर्ट से पता चलता है कि मई में इंडोनेशिया से सभी पाम तेल उत्पादों के शिपमेंट में अच्छी बढ़ोत्तरी हुई।&nbsp;</span></p><p>इंटरटेक द्वारा संकलित आंकड़ों के अनुसार अप्रैल की तुलना में मई 2025 के दौरान इंडोनेशिया से क्रूड पाम तेल (सीपीओ) का निर्यात 47 हजार टन से बढ़कर 2 लाख टन, आरबीडी पामोलीन का निर्यात 5.45 लाख टन से उछलकर 8.18 लाख टन तथा रिफाइंड पाम तेल का शिपमेंट 2.74 लाख टन से सुधरकर 3.60 लाख टन पर पहुंच गया। अन्य पाम तेल उत्पादों के निर्यात में भी बढ़ोत्तरी हुई।&nbsp;</p><p>समीक्षाधीन अवधि के दौरान इंडोनेशिया से पाम तेल उत्पादों का निर्यात भारत में 2.43 लाख टन से 141 प्रतिशत उछलकर 5.87 लाख टन, चीन को 2.72 लाख टन से 15 प्रतिशत बढ़कर 3.12 लाख टन तथा यूरोपीय संघ को 2.65 लाख टन से 14 प्रतिशत सुधरकर 3.01 लाख टन पर पहुंच गया।&nbsp;</p><p>भारत में जनवरी से अप्रैल 2025 के दौरान पाम तेल का आयात बहुत कम हुआ क्योंकि इसका अंतर्राष्ट्रीय बाजार भाव सोयाबीन तेल से काफी ऊपर चल रहा था। वैश्विक बाजार में दोनों खाद्य तेल एक-दूसरे के प्रतिद्वंदी हैं। </p><p>आतमौर पर पाम तेल का दाम सोयाबीन तेल से 100-150 डॉलर प्रति टन नीचे रहता है मगर जनवरी-अप्रैल में यह 100-150 डॉलर प्रति टन ऊपर रहा। </p><p>इसके फलस्वरूप क्रूड पाम तेल के बजाए भारतीय रिफाइनर्स ने क्रूड सोयाबीन तेल के आयात को प्राथमिकता देना शुरू कर दिया। इसके बाद जब मलेशिया इंडोनेशिया में पाम तेल का बकाया अधिशेष स्टॉक तेजी से बढ़ने लगा तब इसकी कीमतों पर दबाव पड़ना शुरू हो गया और इसका भाव घटकर सोया तेल से नीचे आ गया।&nbsp;</p><p>2023-24 के मार्केटिंग सीजन (नवम्बर-अक्टूबर) के दौरान भारत में प्रतिमाह औसतन 7.50 लाख टन पाम तेल का आयात किया गया जबकि 2024-25 सीजन की पहली छमाही में यह औसत मासिक आयात घटकर 5 लाख टन से भी नीचे आ गया।&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;&nbsp;</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/18926</guid>				
                <pubDate>Wed, 18 Jun 2025 15:23:07 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[डीडीजीएस की वजह से सोयामील की घरेलू खपत प्रभावित होने की संभावना]]></title>
                <link><![CDATA[https://backup.igrain.in/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">इंदौर। भारत में 2024-25 सीजन के साथ-साथ 2025-26 के मार्केटिंग सीजन में भी सोयामील की घरेलू मांग एवं खपत घटने की संभावना व्यक्त की गई है क्योंकि पशु आहार एवं पोल्ट्री फीड निर्माण में डिस्टीलर्स ड्राईड ग्रेन्स विद सोल्यूबल्स (डीडीजीएस) का उपयोग तेजी से बढ़ता जा रहा है। इसके फलस्वरूप निर्यात उद्देश्य के लिए भारत में सोयामील का स्टॉक बढ़ने की उम्मीद है। </span></p><p><span style="font-size: 1rem;">अमरीकी कृषि विभाग (उस्डा) की रिपोर्ट के अनुसार भारत सरकार ने पेट्रोल में एथनॉल के मिश्रण का 20 प्रतिशत लक्ष्य अब वर्ष 2030 के बजाए 2025 तक के लिए निर्धारित कर दिया है जिससे अनाज आधारित और खासकर मक्का से निर्मित एथनॉल की उपलब्धता बढ़ सकती है। गन्ना से एथनॉल का उत्पादन पूर्ववत जारी है।&nbsp;</span></p><p>मक्का का उपयोग एथनॉल निर्माण में लगातार बढ़ता जा रहा है जिससे डीडीजीएस की उपलब्धता में भी वृद्धि हो रही है। इससे फीड निर्माता इसका उपयोग बढ़ाने पर विशेष जोर दे रहे हैं क्योंकि यह सोयामील से काफी सस्ता होता है। </p><p>डीडीजीएस का भाव मार्च में 225 डॉलर प्रति टन या जबकि सोयामील का दाम 416 डॉलर प्रति टन के ऊंचे स्तर पर दर्ज किया गया था। इसके फलस्वरूप घरेलू प्रभाव में सिर्फ चालू सीजन में ही नहीं बल्कि अगले मार्केटिंग सीजन में भी सोयाबीन की मांग एवं खपत प्रभावित होने की संभावना है। </p><p>डीडीजीएस की उपलब्धता लगभग संतृप्त स्तर पर पहुंच गई है। उस्डा के अनुसार भारत से 2024-25 के वर्तमान मार्केटिंग सीजन (अक्टूबर-सितम्बर) में करीब 18 लाख टन सोयामील का निर्यात होने की उम्मीद है जो 2025-26 के सीजन में घटकर 14 लाख टन पर सिमट सकता है।&nbsp;</p><p>चालू मार्केटिंग सीजन में भारत से सोयामील का निर्यात मुख्यतः यूरोपीय संघ के सदस्य देशों, बांग्ला देश एवं नेपाल आदि को हो रहा है क्योंकि इसकी कीमत प्रतिस्पर्धी स्तर पर चल रही है। दक्षिण-पूर्व एशिया के देश भी इसकी खरीद में दिलचस्पी दिखा रहे हैं। ईरान में निर्यात प्रभावित होने की संभावना है।&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;&nbsp;</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/18922</guid>				
                <pubDate>Wed, 18 Jun 2025 13:37:01 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[क्रूड पाम तेल पर आयात शुल्क में कटौती के निर्णय पर पुनर्विचार का आग्रह]]></title>
                <link><![CDATA[https://backup.igrain.in/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">विशाखापट्नम। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री ने केन्द्र सरकार से क्रूड खाद्य तेलों और खासकर क्रूड पाम तेल पर आयात शुल्क में की गई भारी कटौती पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया है। </span></p><p><span style="font-size: 1rem;">केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री को भेजे एक पत्र में मुख्यमंत्री ने कहा है कि क्रूड पाम तेल का आयात सस्ता होने से आंध्र प्रदेश में ऑयल पाम के 'ताजे फलों के गुच्छे' (एफएफबी) की कीमतों में गिरावट आने तथा राज्य के उत्पादकों को लाभप्रद मूल्य प्राप्त नहीं होने की आशंका बढ़ गई है। </span></p><p><span style="font-size: 1rem;">उल्लेखनीय है कि कुछ दिन पूर्व जब केन्द्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री ने आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री से उनके निकास स्थान पर मुलाकात की थी तब उनसे भी इसी तरह का आग्रह किया गया था।&nbsp;</span></p><p>जब तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) के सांसदों के एक शिष्टमंडल ने 17 जून को केन्द्रीय गृह मंत्री से मुलाकात करके उनसे क्रड पाम तेल (सीपीओ) पर आयात शुल्क में हुई कटौती के निर्णय पर दोबारा विचार करने का आग्रह किया है। </p><p>शिष्टमंडल ने गृह मंत्री को मुख्यमंत्री का वह पत्र सौंपा जिसमें सीपीओ पर आयात शुल्क घटाने के फैसले पर पुनर्विचार करने के लिए कहा गया था। </p><p>ध्यान देने की बात है कि केन्द्र सरकार ने 30 मई को एक गजट अधिसूचना जारी करके क्रूड श्रेणी के पाम तेल, सोयाबीन तेल एवं सूरजमुखी तेल पर मूल आयात शुल्क को 20 प्रतिशत से घटाकर 10 प्रतिशत नियत किया था और यह निर्णय तत्काल प्रभाव से लागू भी हो गया था।&nbsp;</p><p>पत्र में कहा गया है कि पीक प्लांटेशन सीजन के दौरान सीमा शुल्क में की गई कटौती से नेशनल मिशन ऑन एडिबल ऑयल्स- ऑयल पाम की सफलता में गंभीर बाधा उत्पन्न हो सकती है और ऑयल पाम के उत्पादों की आमदनी घट सकती है। </p><p>इससे नए-नए पाम बागान लगाने के इच्छुक उत्पादों का उत्साह और मनोबल घट सकता है। भारत में ऑयल पाम एवं पाम तेल के उत्पादन में आंध्र प्रदेश एक अग्रणी राज्य है और वहां उत्पादकों का उत्साह एवं आकर्षण बरकरार रखा जाना चाहिए।&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;&nbsp;</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/18916</guid>				
                <pubDate>Wed, 18 Jun 2025 12:50:39 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[भारत और कनाडा राजनयिक संबंध को मजबूत करने पर सहमत]]></title>
                <link><![CDATA[https://backup.igrain.in/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">ओटावा। भारत और कनाडा नए उच्चायुक्तों की नियुक्ति करने तथा नियमित राजनयिक सेवाओं को दोबारा बहाल करने पर सहमत हो गए हैं जो पिछले साल बंद हो गए थे। </span></p><p><span style="font-size: 1rem;">कनाडा के अल्बर्टा प्रान्त में आयोजित जी-7 सम्मेलन में विशेष आमंत्रित के तौर पर भाग लेने गए भारतीय प्रधानमंत्री के साथ एक खास मीटिंग में कनाडा के प्रधानमंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि दोनों देशों के रिश्तों में आई खटास को दूर किया जाना चाहिए।&nbsp;</span></p><p>उल्लेखनीय है कि कनाडा ने पिछले साल छह भारतीय राजनयिक एवं कौंसुलर अधिकारियों को निष्कासित कर दिया था। इसके जवाब में भारत सरकार ने भी कनाडा के कार्यवाहक उच्चायुक्त एवं पांच अन्य कनाडियन राजनयिकों को भारत छोड़ने का आदेश दिया था।</p><p> तब से अब तक ये सभी पद खाली पड़े हुए हैं। दरअसल कनाडा के पूर्व प्रधानमंत्री पर खालिस्तान समर्थन ग्रुप का दबाव पड़ रहा था और इसलिए उसे वह निर्णय लेना पड़ा था।&nbsp;</p><p>वैसे राजनयिक सम्बन्ध खराब होने का दोनों देशों के व्यापारिक रिश्तों पर कोई असर नहीं पड़ा और आयात-निर्यात की प्रक्रिया बदस्तूर जारी रही। भारत में कनाडा से विशाल मात्रा में पीली मटर तथा मसूर का आयात होता रहा। </p><p>जब भारत सरकार ने मसूर पर 10 प्रतिशत का आयात शुल्क लगाया तब वह सभी आपूर्तिकर्ता देशों पर समान रूप से लागू माना गया। कनाडा के लिए कोई अतिरिक्त सीमा शुल्क नहीं लगाया गया। इसी तरह पीली मटर के शुल्क मुक्त आयात का निर्णय कनाडा के लिए भी मान्य है।&nbsp;</p><p>कनाडा की पिछली सरकार के साथ भारत के रिश्ते अच्छे नहीं थे लेकिन वहां नए प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के नेतृत्व में गठित नई सरकार भारत से सम्बन्ध सुधारने का भरपूर प्रयास कर रही है। </p><p>इसके तहत उन्होंने जी-7 के सम्मलेन में कुछ महत्वपूर्ण देशों के राष्ट्राध्यक्षों / शासनाध्यक्षों को भाग लेने के लिए विशेष रूप से आमंत्रित किया जिसमें भारतीय प्रधानमंत्री भी शामिल थे। </p><p>एक महत्वपूर्ण बाजार एवं व्यापारिक साझीदार के रूप में भारत के महत्व को समझने में कनाडा के नए प्रधानमंत्री को कोई दिक्कत नहीं हो रही है।&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/18898</guid>				
                <pubDate>Wed, 18 Jun 2025 11:46:56 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[नारियल तेल में जबरदस्त उछाल- खुदरा भाव 400 रुपए के पार]]></title>
                <link><![CDATA[https://backup.igrain.in/posts/---400-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">कोच्चि। मिलिंग कोपरा की भारी कमी होने तथा कीमतों में जोरदार तेजी आने से नारियल तेल का खुदरा मूल्य जबरदस्त उछाल के साथ 410 रुपए प्रति लीटर पर पहुंच गया है। पिछले एक सप्ताह के दौरान इसके दाम में 80 रुपए प्रति लीटर की भारी बढ़ोत्तरी हुई है।</span></p><p>कोचीन ऑयल मर्चेंट्स एसोसिएशन (कोमा) के अध्यक्ष के अनुसार मिलिंग कोपरा के उत्पादन में काफी गिरावट आने से इसकी कीमतों में भारी तेजी आई है और इसलिए नारियल तेल का लागत खर्च तेजी से उछल गया है। </p><p>लेकिन कीमतों में जबरदस्त बढ़ोत्तरी होने से नारियल तेल का कारोबार सुस्त पड़ गया है और इसकी मांग 10-20 प्रतिशत घट गई है। नारियल तेल के परम्परागत उपभोक्ता अब अन्य सस्ते विकल्पों की तरफ आकर्षित होने लगे हैं जिसमें पामोलीन और सूरजमुखी तेल भी शामिल हैं। </p><p>रिफाइंड पामोलीन 130 रुपए प्रति लीटर एवं सूरजमुखी तेल 150 रुपए प्रति लीटर पर उपलब्ध हो रहा है। उल्लेखनीय है कि समूचे केरल तथा तमिलनाडु के कुछ भागों में नारियल तेल का उपयोग खाद्य तेल के रूप में किया जाता है।&nbsp;</p><p>कोपरा की कीमतों में तेजी- मजबूती का माहौल बना हुआ है। इसका भाव बढ़कर केरल में 231 रुपए प्रति किलो तथा तमिलनाडु में 227 रुपए प्रति किलो की ऊंचाई पर पहुंच गया है। </p><p>कोमा अध्यक्ष के मुताबिक ईरान-इजरायल युद्ध के कारण सामुद्रिक परिवहन खर्च बढ़ने की संभावना से खाद्य तेलों का आयात महंगा बैठ सकता है। इधर घरेलू प्रभाग में नारियल तेल में अन्य खाद्य तेलों की मिलावट होने की आशंका बढ़ती जा रही है। </p><p>घटिया क्वालिटी के तथा फंगस से संक्रमित कोपरा का उपयोग नारियल तेल उत्पादन में बढ़ता जा रहा है जो स्वास्थ्य के लिए घातक साबित हो सकता है। </p><p>सरकार को घरेलू बाजार में मिलावटी नारियल तेल की बिक्री पर अंकुश लगाने के लिए तत्काल आवश्यक एहतियाती कदम उठाना चाहिए और नारियल तेल तथा कोपरा के आयात पर लागू प्रतिबंध को हटाना चाहिए।&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;&nbsp;</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/18895</guid>				
                <pubDate>Wed, 18 Jun 2025 10:55:19 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[ऑस्ट्रेलिया में मसूर की फसल के लिए मौसम की हालत अनुकूल]]></title>
                <link><![CDATA[https://backup.igrain.in/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">ब्रिसबेन। ऑस्ट्रेलिया में मसूर की बिजाई अंतिम चरण में पहुंच गई है और हाल की बारिश से फसल को राहत मिल रही है। दोनों प्रमुख उत्पादक राज्यों साउथ ऑस्ट्रेलिया एवं विक्टोरिया में चालू माह के दौरान अब तक कम से कम 20 मि०मी० वर्षा हो चुकी है।&nbsp;</span></p><p>सरकारी एजेंसी- अबारेस की रिपोर्ट के अनुसार मसूर का बिजाई क्षेत्र 2024-25 सीजन के मुकाबले 2025-26 सीजन के दौरान साउथ ऑस्ट्रेलिया में 5.30 लाख हेक्टेयर से घटकर 4.76 लाख हेक्टेयर, विक्टोरिया में 5.20 लाख हेक्टेयर से लुढ़ककर 4.70 लाख हेक्टेयर,</p><p> न्यू साउथ वेल्स में 35 हजार हेक्टेयर से गिरकर 30 हजार हेक्टेयर तथा क्वींसलैंड में 1300 हेक्टेयर से फिसलकर 1100 हेक्टेयर रह जाने एक अनुमान है जबकि वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया में यह 10,500 हेक्टेयर से सुधरकर 15000 हेक्टेयर पर पहुंचने के आसार हैं।&nbsp;</p><p>अबारेस की तिमाही रिपोर्ट में समीक्षाधीन अवधि के दौरान मसूर का उत्पादन साउथ ऑस्ट्रेलिया में 7.50 लाख टन से घटकर 6.90 लाख टन, विक्टोरिया में 6.50 लाख टन से लुढ़ककर 5.55 लाख टन, </p><p>न्यू साउथ वेल्स में 50 हजार टन से गिरकर 30 हजार टन तथा क्वींसलैंड में 1500 टन से फिसलकर 1200 टन पर सिमट जाने का अनुमान लगाया गया है जबकि वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया में उत्पादन 16 हजार टन से बढ़कर 21 हजार टन पर पहुंचने की संभावना व्यक्त की गई है।&nbsp;</p><p>दरअसल बिजाई के शुरूआती चरण में वहां मौसम शुष्क बना हुआ था जिससे कुछ क्षेत्रों में बीज में ठीक से अंकुरण नहीं हो सका और क्षेत्रफल में भी गिरावट आ गई।&nbsp;</p><p>ऑस्ट्रेलिया में मसूर का कारोबार काफी कम हो रहा है और सितम्बर से इसकी रफ्तार तेज होने की उम्मीद है। यदि मसूर की अगली फसल की उपज दर औसत स्तर की आंकी गई तो उत्पादकों को पुराना स्टॉक बाहर निकालने में सहायता मिल जाएगी। </p><p>दक्षिण एशिया की कमजोर मांग के कारण मसूर की अगली नई फसल का भाव मौजूदा स्टॉक के मुकाबले 100 डॉलर प्रति टन नीचे चल रहा है। बांग्ला देश एवं श्रीलंका द्वारा इसकी थोड़ी बहुत खरीद की जा रही है। भारत में 1 अप्रैल से मसूर पर 11 प्रतिशत का आयात शुल्क लागू है।&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;&nbsp;</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/18885</guid>				
                <pubDate>Tue, 17 Jun 2025 20:34:10 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[खरीफ कालीन दलहन फसलों के बिजाई क्षेत्र में अनिश्चितता]]></title>
                <link><![CDATA[https://backup.igrain.in/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">नई दिल्ली। विदेशों से विशाल मात्रा में सस्ते माल का आयात जारी रहने तथा घरेलू बाजार भाव घटकर न्यूनतम समर्थन मूल्य के आसपास आ जाने से खरीफ कालीन दलहन फसलों के उत्पादन क्षेत्र में बढ़ोत्तरी की संभवाना अनिश्चित हो गई है। </span></p><p><span style="font-size: 1rem;">हालांकि केन्द्र सरकार ने तुवर एवं उड़द के न्यूनतम समर्थन मूल्य में अच्छा इजाफा किया है और किसानों से इसकी 100 प्रतिशत खरीद करने का संकल्प भी व्यक्त किया है लेकिन किसानों में इसकी खेती के प्रति अपेक्षित उत्साह एवं आकर्षण नहीं देखा जा रहा है।&nbsp;</span></p><p>खरीफ कालीन दलहन फसलों की बिजाई आरंभ हो चुकी है और 13 जून तक इसका रकबा 3.07 लाख हेक्टेयर पर पहुंचा जो पिछले साल की समान अवधि के क्षेत्रफल 2.60 लाख हेक्टेयर से 47 हजार हेक्टेयर ज्यादा है। </p><p>मगर इस बढ़ोत्तरी में मूंग एवं उड़द का योगदान है जबकि तुवर का बिजाई क्षेत्र गत वर्ष से पीछे चल रहा है। दिलचस्प तथ्य यह है कि तुवर के दोनों शीर्ष उत्पादक राज्यों- महाराष्ट्र एवं कर्नाटक में इस बार अच्छी बारिश हुई है मगर किसानों में पिछले साल वाला जोश नहीं है।&nbsp;</p><p>निस्संदेह फिलहाल बिजाई का आरंभिक चरण है और आगे परिस्थिति में बदलाव हो सकते हैं। ऐसा होना भी चाहिए क्योंकि देश में दलहनों का आयात उछलकर नए-नए रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने लगा है जबकि सरकार ने वर्ष 2027-28 तक इसके उत्पादन में आत्मनिर्भरता का लक्ष्य रखा है। </p><p>दलहनों के आधार पर न केवल अत्यन्त विशाल धनराशि खर्च हो रही है बल्कि इसकी वजह से स्वदेशी किसानों के अपने उत्पाद का लाभप्रद मूल्य प्राप्त करने के लिए कठिन संघर्ष भी करना पड़ रहा है।&nbsp;</p><p>चालू खरीफ सीजन के लिए दलहन फसलों का कुल औसत उत्पादन क्षेत्र 129.60 लाख हेक्टेयर आंका गया है जिसमें तुवर का क्षेत्रफल 44.71 लाख हेक्टेयर, उड़द का 32.64 लाख हेक्टेयर, मूंग का 35.69 लाख हेक्टेयर, मोठ का 10.19 लाख हेक्टेयर, कुलथी का 1.78 लाख हेक्टेयर तथा अन्य दलहनों का सामान्य औसत क्षेत्रफल 4.59 लाख हेक्टेयर शामिल है। </p><p>दलहन फसलों की जोरदार बिजाई जुलाई-अगस्त में होती है और उस समय मानसून की भारी बारिश होने का अनुमान व्यक्त किया जा रहा है। इससे किसानों को क्षेत्रफल बढ़ाने में सहायता मिल सकती है। </p><p>सरकार ने पिछले साल के मुकाबले चालू वर्ष के लिए तुवर का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) 7550 रुपए प्रति क्विंटल से 450 रुपए बढ़ाकर 8000 रुपए प्रति क्विंटल तथा उड़द का एमएसपी 7400 रुपए प्रति क्विंटल से 400 रुपए बढ़ाकर 7800 रुपए प्रति क्विंटल नियत किया है जबकि मूंग के संवर्धन मूल्य में 86 रुपए की वृद्धि की गई है।&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/18877</guid>				
                <pubDate>Tue, 17 Jun 2025 17:56:08 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[राष्ट्रीय स्तर पर खरीफ फसलों का उत्पादन क्षेत्र 89.29 लाख हेक्टेयर से ऊपर पहुंचा]]></title>
                <link><![CDATA[https://backup.igrain.in/posts/-89-29-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">नई दिल्ली। थोड़ी प्रतीक्षा के बाद अंततः केन्द्रीय कृषि मंत्रालय ने खरीफ फसलों के उत्पादन क्षेत्र का आंकड़ा जारी करना शुरू कर दिया है। इसके तहत कुछ फसलों के क्षेत्रफल में अच्छी वृद्धि हुई है जबकि फसलों का रकबा गत वर्ष से नीचे चल रहा है। </span></p><p><span style="font-size: 1rem;">कृषि मंत्रालय के अनुसार राष्ट्रीय स्तर पर 13 जून 2025 तक खरीफ फसलों का कुल उत्पादन क्षेत्र सुधरकर 89.29 लाख हेक्टेयर पर पहुंचा जो पिछले साल की समान अवधि के बिजाई क्षेत्र 87.81 लाख हेक्टेयर से 1.48 लाख हेक्टेयर अधिक रहा।&nbsp;</span></p><p>पिछले माल की तुलना में इस बार धान का उत्पादन क्षेत्र 4.00 लाख हेक्टेयर से सुधरकर 4.53 लाख हेक्टेयर, दलहनों का बिजाई क्षेत्र 2.60 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 3.07 लाख हेक्टेयर, तिलहनों का क्षेत्रफल 1.50 लाख हेक्टेयर से सुधरकर 2.05 लाख हेक्टेयर तथा गन्ना का रकबा 54.88 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 55.07 लाख हेक्टेयर पर पहुंच गया। </p><p>श्री अन्न सहित मोटे अनाजों का क्षेत्रफल 5.90 लाख हेक्टेयर के पुराने स्तर पर स्थिर रहा मगर कपास का बिजाई क्षेत्र 13.28 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 1.56 लाख हेक्टेयर तथा उड़द का बिजाई क्षेत्र 18 हजार हेक्टेयर से बढ़कर 43 हजार हेक्टेयर पर पहुंचा लेकिन अरहर (तुवर) का क्षेत्रफल 41 हजार हेक्टेयर से गिरकर 30 हजार हेक्टेयर रह गया। कुलथी सहित अन्य दलहनों की बिजाई अभी सीमित क्षेत्रफल में हुई है।&nbsp;</p><p>तिलहन फसलों में मूंगफली का उत्पादन क्षेत्र 71 हजार हेक्टेयर से घटकर 58 हजार हेक्टेयर रह गया&nbsp; मगर सोयाबीन का बिजाई क्षेत्र 40 हजार हेक्टेयर से उछलकर 1.07 लाख हेक्टेयर पर पहुंच गया। सूरजमुखी का रकबा 22 हजार हेक्टेयर के समान स्तर पर रहा।&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/18875</guid>				
                <pubDate>Tue, 17 Jun 2025 17:15:21 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[कर्नाटक में विभिन्न खरीफ फसलों के बिजाई क्षेत्र में मिश्रित रुख]]></title>
                <link><![CDATA[https://backup.igrain.in/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">बंगलोर। दक्षिण भारत के एक महत्वपूर्ण कृषि उत्पादक राज्य- कर्नाटक में यद्यपि खरीफ फसलों का कुल उत्पादन क्षेत्र पिछले साल के 20.22 लाख हेक्टेयर से 20 हजार हेक्टेयर बढ़कर इस वर्ष 13 जून तक 20.42 लाख हेक्टेयर पर पहुंच गया लेकिन इसके तहत कुछ फसलों के बिजाई क्षेत्र में बढ़ोत्तरी हुई तो कुछ अन्य फसलों के क्षेत्रफल में गिरावट दर्ज की गई।&nbsp;</span></p><p>कर्नाटक कृषि विभाग के नवीनतम साप्ताहिक आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2024 की तुलना में वर्ष 2025 के दौरान 13 जून तक राज्य में धान का उत्पादन क्षेत्र 43 हजार हेक्टेयर से घटकर 33 हजार हेक्टेयर रह गया मगर ज्वार का रकबा 28 हजार हेक्टेयर से सुधरकर 31 हजार बाजरा का बिजाई क्षेत्र 26 हजार हेक्टेयर से बढ़कर 30 हजार हेक्टेयर तथा मक्का का क्षेत्रफल 5.68 लाख हेक्टेयर से उछलकर 6.37 लाख हेक्टेयर पर पहुंच गया। इसके फलस्वरूप अनाजी फसलों का कुल उत्पादन क्षेत्र गत वर्ष के 6.84 लाख हेक्टेयर से बढ़कर इस बार 7.43 लाख हेक्टेयर हो गया।&nbsp;</p><p>लेकिन दलहन फसलों का उत्पादन क्षेत्र गत वर्ष 4.91 लाख हेक्टेयर से 30 हजार हेक्टेयर घटकर इस बार 4.61 लाख हेक्टेयर पर अटक गया। </p><p>इसके तहत अरहर (तुवर) का रकबा 1.65 लाख हेक्टेयर&nbsp; से गिरकर 1.12 लाख हेक्टेयर तथा उड़द का बिजाई क्षेत्र 38 हजार हेक्टेयर से फिसलकर 37 हजार हेक्टेयर पर अटक गया जबकि मूंग का क्षेत्रफल 2.47 लाख हेक्टेयर से सुधरकर 2.54 लाख हेक्टेयर&nbsp; पर पहुंच गया।&nbsp;</p><p>लेकिन तिलहन फसलों का कुल उत्पादन क्षेत्र पिछले साल के 1.92 लाख हेक्टेयर से 8 हजार हेक्टेयर बढ़कर इस बार 2.00 लाख हेक्टेयर हो गया। </p><p>इसके तहत यद्यपि मूंगफली का बिजाई क्षेत्र 57 हजार हेक्टेयर से घटकर 36 हजार हेक्टेयर रह गया मगर तिल का क्षेत्रफल 7 हजार हेक्टेयर से बढ़कर 12 हजार हेक्टेयर, सूरजमुखी का क्षेत्रफल 25 हजार हेक्टेयर से सुधरकर 27 हजार हेक्टेयर तथा सोयाबीन का उत्पादन क्षेत्र 1.01 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 1.24 लाख हेक्टेयर पर पहुंच गया।</p><p>लेकिन कपास का उत्पादन क्षेत्र पिछले साल के 1.59 लाख हेक्टेयर से 15 हजार हेक्टेयर घटकर इस बार 1.44 लाख हेक्टेयर रह गया।</p><p> कर्नाटक में इस बार खरीफ फसलों के कुल उत्पादन क्षेत्र का लक्ष्य 82.50 लाख हेक्टेयर नियत किया गया है जिसमें से 20.42 लाख हेक्टेयर में बिजाई पहले ही पूरी हो चुकी है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/18873</guid>				
                <pubDate>Tue, 17 Jun 2025 16:40:17 +0530</pubDate>
            </item>
                
    </channel>

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